तुम्हारी जात में तितलियां कैसी दिखती हैं?
चलो बाल बना लेता हूं, दफ्तर के लिए जो निकलना है।
अरे शर्मा गुप्ता अग्रवाल मेहरा सिंह कुमार सक्सेना कैसे हो सब?
तुम्हारे यहाँ ये कैसे होता है? हमारे यहाँ तो ऐसा होता है।
घर जाऊंगा सूट बूट पहन कर अपने आप में फूला ना समाऊंगा।
फिर वही बात अपनी पांच डिग्रियों से मिली नौकरी के केबिन में चीख चीख के चिल्लाउंगा
मेरे बाप दादा की मेहनत पर खूब मजे लूटूंगा, ऊंचा नीचा, अगला पीछा सब कुछ कह जाऊंगा
हर बात में अपने होने पर इतना गौरव दिखलाऊंगा, तुम कौन तुम्हारा वंश क्या है इसपर सीख पढ़ाऊँगा
चार लोगों को देख उन्पर खींज कर अपने आप को बड़ा पाउंगा
वन शॉल नॉट डिस्क्रिमिनेट ऑन द बेसिस ऑफ़ कास्ट क्रीड
क्लास एंड जेंडर की सीख को, एक धार पेशब में सर..र से बहाऊँगा
जो दो कौड़ी और मेरे मुँह पर फेंकोगे तो देश से भाग जाऊंगा, फिर भी अपने आप को सच्चा भारतीय बतलाऊंगा
बेकार सड़क ख़राब माहौल की रट लगाये देखना तुम इस देश के लिए मैं बस इतना कर जाऊँगा
भारतीय? ब्राह्मण? जैन? फलाना? ढिमकाना? उच्छ कोटि? नीच कोटि? किसकी कोटि? इसकी धोती? उसकी धोती?
अरे सांस लेले, आंखें खोल ले, किस पर्वत पर चढ़ कर किसको क्या बतलाना है? तू कौन है तेरा कौन है? इससे हमने क्या करवाना है?
आज है तू, कल नहीं, नाम बड़ा हो, जरूरी नहीं मलीन तो नहीं।
जहां गांधी की छवि, हिटलर की घड़ी, सब बिक जाता है उस संसार में तू कौन कहलाता है?
देख उस पेड़ पर एक तितली बैठी है, खूब चमकीली, 20 दिन उसके जीवन के, उसमें ना एक दिन वो ये सब बोली है, सोच वो कितनी जी ली और तूने कितनी जिंदगी खो दी है।
© कशिश सक्सेना

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ReplyDelete👏🏼👏🏼
ReplyDeleteHeartfelt writing
ReplyDeleteSocho, agar emotions ki bhi jaat hoti !
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